कैमरे से क्यों घबराई व्यवस्था? सरकारी स्कूल की बदहाली दिखाने पहुंचे यूट्यूबर पर मुकदमा, मरदह के महाहर में उठे गंभीर सवाल…।

गाजीपुर ।
सरकारी स्कूलों की व्यवस्था, शिक्षकों की उपलब्धता, भवनों की स्थिति और बच्चों को मिल रही शैक्षणिक सुविधाओं पर सवाल उठाना लोकतंत्र में जनहित का विषय है। लेकिन गाजीपुर के मरदह क्षेत्र में सामने आया एक मामला अब इसी सवाल को कटघरे में खड़ा कर रहा है। महाहर स्थित प्राथमिक विद्यालय की कथित बदहाली की तस्वीर सामने लाने पहुंचे एक स्थानीय यूट्यूबर को रोकने और उसके तथा दो अन्य साथियों के खिलाफ पुलिस में तहरीर देकर मुकदमा दर्ज कराने की कार्रवाई ने शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामले ने यह बहस तेज कर दी है कि सरकारी विद्यालयों में व्यवस्था सुधारने की जरूरत है या व्यवस्था की कमियां दिखाने वालों को रोकने की? यदि किसी विद्यालय में सब कुछ बेहतर है तो कैमरा किस बात का खतरा है और यदि कमियां हैं तो उन्हें सामने आने से रोकने की कोशिश क्यों?
बताया जा रहा है कि स्थानीय यूट्यूबर महाहर स्थित प्राथमिक विद्यालय की वास्तविक स्थिति को कैमरे में दर्ज करने पहुंचा था। आरोप है कि विद्यालय के प्रधानाध्यापक ने उसे वीडियो बनाने से रोक दिया। इसके बाद उसके और उसके दो साथियों के खिलाफ मरदह थाने में तहरीर दी गई और पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी।
प्रधानाध्यापक की ओर से आरोप लगाया गया है कि बिना अनुमति वीडियो बनाया जा रहा था तथा बच्चों को डराने-धमकाने से विद्यालय का वातावरण प्रभावित हुआ। हालांकि, पूरे मामले की सच्चाई पुलिस जांच के बाद ही स्पष्ट होगी। लेकिन इस कार्रवाई ने एक बड़ा और असहज सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या सरकारी स्कूल, जहां जनता के पैसे से शिक्षा व्यवस्था संचालित होती है, वहां की वास्तविक स्थिति जनता और अभिभावकों से छिपाई जानी चाहिए?
व्यवस्था पर सवाल उठे तो कैमरा ही अपराधी क्यों?
सरकारी विद्यालय किसी निजी संस्था की संपत्ति नहीं, बल्कि जनता के लिए संचालित सार्वजनिक संस्थान हैं। यहां पढ़ने वाले बच्चे समाज और देश का भविष्य हैं। ऐसे में विद्यालय में शिक्षक पर्याप्त हैं या नहीं, भवन सुरक्षित है या नहीं, पढ़ाई नियमित हो रही है या नहीं और बच्चों को मूलभूत सुविधाएं मिल रही हैं या नहीं—इन सवालों का जवाब जानना अभिभावकों और समाज का स्वाभाविक अधिकार माना जाता है।
पत्रकारों अथवा सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों के विद्यालयों में प्रवेश और वीडियो बनाने को लेकर नियम-कायदे हो सकते हैं और बच्चों की निजता व पढ़ाई प्रभावित न हो, यह भी जरूरी है। लेकिन नियमों की आड़ में यदि कहीं वास्तविक समस्याओं को सामने आने से रोकने का प्रयास होता है, तो यह पारदर्शिता की भावना के विपरीत होगा।
पाबंदी व्यवस्था की कमियों पर लगे, सवाल पूछने वालों पर नहीं —
महाहर की घटना ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। यदि विद्यालय में व्यवस्थाएं दुरुस्त हैं, पढ़ाई सुचारु है और बच्चों को सभी जरूरी सुविधाएं मिल रही हैं तो निष्पक्ष जांच और निरीक्षण के जरिए स्थिति स्पष्ट की जा सकती है। वहीं यदि कहीं कमियां हैं तो उनका समाधान होना चाहिए, न कि उन कमियों को सामने लाने वाले व्यक्ति को ही कठघरे में खड़ा किया जाए।
फिलहाल पुलिस मामले की जांच कर रही है। जांच के बाद आरोपों की वास्तविकता सामने आएगी। लेकिन इस प्रकरण ने शासन-प्रशासन के सामने एक बुनियादी सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—सरकारी शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता कैमरे से तय होगी या उसकी वास्तविक स्थिति सुधारने से?
जनता अब यह जानना चाहती है कि विद्यालय में वास्तव में क्या स्थिति थी और आखिर ऐसा क्या था जिसे कैमरे की नजर से रोकने की जरूरत महसूस हुई। जांच का निष्पक्ष होना इसलिए भी जरूरी है, ताकि न तो किसी निर्दोष के साथ अन्याय हो और न ही सरकारी विद्यालयों की किसी वास्तविक कमी पर पर्दा पड़ सके।

